" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

>> सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

पहले नज़ाकत बोलें थी,अब गुमान बोलें है
अजी दोस्त अब दुश्मन की जबान बोलें है

चुप-चुप रहें है अब दूर-दूर रहें है वो हमसे
न उसके भेस में अब,कोई अनजान बोले है

एक मूहँ पे पर्दा,इक मूहँ से सलाम बोलें है
हम भी कहाँ यारों से सीधी जबान बोलें है

चार सौ की कोठरी अर तीन सौ का प्यार
नया दौर है ओ नए दौर में इन्सान बोलें है

अब तो सबको बताता हूँ एजाज-ए-बेदिल
एक ग़ो सुना था बालकों में भगवान् बोलें है

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Pahle Nazakatt bole thi.Ab gumaan bole hai
ajji dost ab dushman ki jabaan bole hai

Chup Chup Rahe hai ab dur dur rahe hai wo hamse
na uske bhes me ab,koi Anjaan bole hai

ek muh pe parda,ik muh se salaam bole hai
Ham bhi kaha Yaaro se sidhi jabaan bole hai

Char so ki kothri ar teen so ka pyar
naya dor hai,o,naye dor me insaan bole hai

Ab to sabko batata hoon Ajaaj-e-bedil
ek go suna tha baalko me bhagwaan bole hai

Deepak "bedil"

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>> गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

अच्छा तो हम चलते है तेरे इस शहर दीवाने से
करते है लोग बगावत इक यहाँ हमारे आने से

गुमनाम ओ पोशीदा इंसान जो जो हुए है यहाँ
वो मारे डर के नहीं निकला करते बूतखाने से

क्या बात हुई है जो करके आये हो आँखे लाल
ना लगता हमें की समझ जाओगे समझाने से

ये मुद्दा भी तेरा जिक्र भी तेरा करू हूँ दिल्ली
पहले ही उजाड़ देते है लोग घर को बसाने से

जितने पाक बदन और जितने काजी है यहाँ
सबसे कह दो की जरा दूर रहे उस दीवाने से

है बहुत नाराज हमसे और भला क्या कहिये
पर मान जावेंगे सुनो हो इक गले लगाने से

दीदा-ए-तर होकर भी झूठे ही रहोगे 'बेदिल'
भला किसको मिला है यकीन टेसुए बहाने से

Deepak "bedil"


Achaa to ham chalte hai tere is shehar diwaane se
karte hai log bagawat ik yaha hamare aane e

gumnaam o poshida insaan jo jo hue hai yaha
wo maare dar ke nahi nikla karte bootkhaane se

kya baat hui hai jo karke aaye ho aankhe laal
naa lagta hame ki samjh jaoge samjhaane se

ye mudda bhi tera jikar bhi tera karu hoo dilli
pahle hi ujaad dete hai log ghar ko basaane se

jitne paak badan or jitne kaaji hai yaha
sabse kah do ki jara door rahe us diwaane se

hain bahut naraaj hamse or bhala kya kahiye
par maan jawenge suno ho ik gale lagane se

dida-e-tar hokar bhi jhoothe hi rahoge "bedil"
bhala kisko mila hai yakeen tesu'a bahaane se

Deepak "bedil"




1-tesu'a = rona
2.poshida = chupa huaa
3.bootkhaane = mandir

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जिसने हमें बनाया इंसान सदा के लिए

>> मंगलवार, 4 मई 2010

हम भी रखते है रोजे उस खुदा के लिए
जिसने हमें बनाया इंसान सदा के लिए

वफाये,हमारी मुहब्बत में खूब है ताल्लुक
नही करते हम भी इश्क़ अदा के लिए

अपने महबूब के पास हैं तो है जान मे जान
जुदाई हरगीस ना देना नसीब खुदा के लिए

दीपक "बेदिल"
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Ham bhi rakhte hai roje us khuda ke liye
jisne hame banaya insaan sada ke liye

hamari wafaye,hamari mohhobbat me khub hai taalluk
nahi karte ham bhi ishq aada ke liye

apne mahboob ke paas hain to hai jaan me jaan
judaai hargis naa dena nasib khuda ke लिए

Deepak "bedil"

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तुम भी परेशां हम भी परेशान दिल्ली में

>> सोमवार, 23 नवंबर 2009

तुम भी परेशां हम भी परेशान दिल्ली में
हम दो ही तो दुखी है इन्सान दिल्ली में

किसी भूके को यहाँ कोई रोटी नहीं देता
दिल छोटे और बड़े है मकान दिल्ली में

रिश्ता बनता नहीं की टूट जाता है पहले
इश्क हो या दोस्ती कुछ नहीं आसान दिल्ली में

आते आते आया ख्याल ये भी तोबा की
मौत है महँगी सस्ती है जान दिल्ली में

यु तो हादसे हर रात होते है बेदिल मगर
बचते नहीं सुबह उनके निशान दिल्ली में

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TUm Bhi Preshaan Ham Bhi Preshaan Delhi Me
Ham Do Hi To Dukhi Hai Insaan Delhi Me

Kisi Bhukhe Ko Yaha Koi Roti Nahi Deta
Dil Chote Or Bade Hai Makaan Delhi Me

Rishta Banta Nahi Ki Toot Jata Hai Pahle
Ishq Ho Yaa Dosti Kuch Nahi Asaan Delhi Me

Aate Aate Aaya Khayaal Ye Bhi Toba Ki
Mout Hai Mahngi Sasti Hai Jaan Delhi Me

Yu to Haadse Har Raat HOte Hai "bedil" Magar
Bachte Nahi Subha Unke Nishaan Delhi Me


Deepak "bedil"

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इश्क में आशिक जलते है आज कल तो

>> शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

इश्क में आशिक जलते है आज कल तो
कुचे-कुचे में ये मिलते है आज कल तो

अब जो ये फूल है पहले जैसे नहीं रहे
गली-किनारे में खिलते है आज कल तो

आशिको को रु-शिनास तुमसे क्या करे
हुजुर घर बेठे ही पलते है आज कल तो

क्या शिकवा है उन्हें या खता हमसे हुई
वो दूर-दूर हम से चलते है आज कल तो

रोते-रोते रात में सोए है मिया "बेदिल"
क्या ग़म है नहीं कहते है आज कल तो

(Hinglish)



Ishq me Aashik Jalte Hai Aaj Kal to
Kuche - kuche me ye Milte hai Aaj Kal To

Ab Jo ye Phool Hai Pahle Jese Nahi Rahe
Gali - Kinaare Me Khilte Hai Aaj Kal To

Aashiko ko Ruu-Shinaas Tumse kya Kare
hujur Ghar Bethe Hi Palte Hai Aaj Kal To

Kya Shikwa Hai Unhe Yaa KHata Ham Se Hui
Wo Dur-Dur Ham Se Chalte Hai Aaj Kal to

Rote - Rote Raat Me Soye Hai Miya "Bedil"
Kya Gam Hai Nahi Kahte Hai Aaj Kal To


Deepak "bedil"...

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कल उनसे मुलाकात होनी है

>> रविवार, 30 अगस्त 2009

--->> "Hindi" <<---
आज-कल में उनसे मुलाकात होनी है
उनकी मोहोबत में दिन से रात होनी है

खुशिया दिलो की छः से सात होनी है
जब मुस्कुराकर बातो पर बात होनी है

बाहों में लेने का बहाना भी मिल जाए
गर् कड़के बिजली लगे बरसात होनी है

उनका हुस्न, उनके चहरे की मासूमियत
नाज-ओ-नखरे,तबाह कायेनात होनी है

दिल आवारा बंजारा पगला भी "बेदिल"
चंद अल्फाजो में उनकी क्या बात होनी है

Deepak "bedil"....

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-->> " Hinglish " <<--
Aaj Kal Me Unse Mulakaat Honi Hai
Unki Mohobat Me Din Se Raat Honi Hai

Khushiya Dilo Ki Che se Saat Honi Hai
Jab Muskuraa'kar Baato Par Baat Honi Hai

Baaho Me Lene Ka Bahaana Bhi Mil Jaaye
Gar Kadke Beej'li Lage Barsaat Honi hai

Unka Husan, Unke Chahre ki Masumiyat
Naaj-o-Nakhre, Tabaah Kaayenaat honi hai

Dil Awaara, Banjaara, Pagla Bhi "Bedil"
Chan'nd Alfaajo Me Unki Kya Baat Honi Hai

Deepak "bedil"

नोट - एजाज-ऐ-बेदिल में पहली बार हिन्दी के साथ आज कल की इन्टरनेट की भाषा हिंगलिश का भी पर्योग किया जा रहा है अपने उन साथियो के लिए जो ग़ज़ल को हिन्दी में नही पड़ सकते .

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मेरी इन गज़लों को उठा कर फेकना

>> शनिवार, 13 जून 2009

मेरी इन गज़लों को उठा कर संभाल कर फेकना
महफ़िल-ए-यार में ना दिल उछाल कर फेकना

इश्क-ओ- आबरू-ओ- शर्म-ओ- हया गजब है
नफरत को ए साहब दिल से निकाल कर फेकना

हस्ती जबतलक इस मैदान-ए-गुलसिता में मेरी
रहगी फिदरत यारो इश्क को बेहाल कर फेकना

ये हुआ की जाट साहब सिर्फ चंद बाते कह पाए
की यारो को मोहोबत में माला-माल कर फेकना

"बेदिल" के कारनामे दिल्ली में मशहूर हो चले है
मुझे दिल से फेकना दोस्त मगर ख्याल कर फेकना

14-06-2009......03:30 am

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Sahitya Shilpi
http://www.chitthajagat.in/?ping=http://ajaaj-a-bedil.blogspot.com/

घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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