" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

>> गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

अच्छा तो हम चलते है तेरे इस शहर दीवाने से
करते है लोग बगावत इक यहाँ हमारे आने से

गुमनाम ओ पोशीदा इंसान जो जो हुए है यहाँ
वो मारे डर के नहीं निकला करते बूतखाने से

क्या बात हुई है जो करके आये हो आँखे लाल
ना लगता हमें की समझ जाओगे समझाने से

ये मुद्दा भी तेरा जिक्र भी तेरा करू हूँ दिल्ली
पहले ही उजाड़ देते है लोग घर को बसाने से

जितने पाक बदन और जितने काजी है यहाँ
सबसे कह दो की जरा दूर रहे उस दीवाने से

है बहुत नाराज हमसे और भला क्या कहिये
पर मान जावेंगे सुनो हो इक गले लगाने से

दीदा-ए-तर होकर भी झूठे ही रहोगे 'बेदिल'
भला किसको मिला है यकीन टेसुए बहाने से

Deepak "bedil"


Achaa to ham chalte hai tere is shehar diwaane se
karte hai log bagawat ik yaha hamare aane e

gumnaam o poshida insaan jo jo hue hai yaha
wo maare dar ke nahi nikla karte bootkhaane se

kya baat hui hai jo karke aaye ho aankhe laal
naa lagta hame ki samjh jaoge samjhaane se

ye mudda bhi tera jikar bhi tera karu hoo dilli
pahle hi ujaad dete hai log ghar ko basaane se

jitne paak badan or jitne kaaji hai yaha
sabse kah do ki jara door rahe us diwaane se

hain bahut naraaj hamse or bhala kya kahiye
par maan jawenge suno ho ik gale lagane se

dida-e-tar hokar bhi jhoothe hi rahoge "bedil"
bhala kisko mila hai yakeen tesu'a bahaane se

Deepak "bedil"




1-tesu'a = rona
2.poshida = chupa huaa
3.bootkhaane = mandir

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Sahitya Shilpi
http://www.chitthajagat.in/?ping=http://ajaaj-a-bedil.blogspot.com/

घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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