" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

>> सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

पहले नज़ाकत बोलें थी,अब गुमान बोलें है
अजी दोस्त अब दुश्मन की जबान बोलें है

चुप-चुप रहें है अब दूर-दूर रहें है वो हमसे
न उसके भेस में अब,कोई अनजान बोले है

एक मूहँ पे पर्दा,इक मूहँ से सलाम बोलें है
हम भी कहाँ यारों से सीधी जबान बोलें है

चार सौ की कोठरी अर तीन सौ का प्यार
नया दौर है ओ नए दौर में इन्सान बोलें है

अब तो सबको बताता हूँ एजाज-ए-बेदिल
एक ग़ो सुना था बालकों में भगवान् बोलें है

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Pahle Nazakatt bole thi.Ab gumaan bole hai
ajji dost ab dushman ki jabaan bole hai

Chup Chup Rahe hai ab dur dur rahe hai wo hamse
na uske bhes me ab,koi Anjaan bole hai

ek muh pe parda,ik muh se salaam bole hai
Ham bhi kaha Yaaro se sidhi jabaan bole hai

Char so ki kothri ar teen so ka pyar
naya dor hai,o,naye dor me insaan bole hai

Ab to sabko batata hoon Ajaaj-e-bedil
ek go suna tha baalko me bhagwaan bole hai

Deepak "bedil"

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Sahitya Shilpi
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घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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