" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

तेरी उन महकती यादों को भुलाया ना जायेगा

>> रविवार, 31 मई 2009

तेरी उन महकती यादों को भुलाया ना जायेगा
अश्क जो गिर चुके उन्हें नजरो में लाया ना जायेगा

थे हम ही नादान दिल वाले बशर महफ़िल में
हमारे जैसा आशिक अब दिल्ली में पाया ना जायेगा

तेरा इश्क कैसा है मेरा इश्क कैसा है बहुत सवाल है तेरे
महफ़िल-ए-यार में चीर के दिल अब दिखाया ना जायेगा

परे हो जायेगे तेरी नजरों से इक मरतबा बोल तो जरा
इस शहर ग़मगीन में अब ताज-ए-महल बनाया ना जायेगा

तुम कहती हो रवानगी ले लो मेरी खुश आबाद जिन्द्कानी से
गर निकला तेरे शहर से सच है वापस आया ना जायेगा

ना ही तुने वफ़ा को संभाला ना इश्क ना ही याराने को
दुश्मन ही साथ देंगे दोस्तों मेरा जनाजा तुमसे उठाया ना जायेगा

तू जालिम है तो क्यों ना तुझे तोहमतों का दरिया देता चलू
"बे-दिल" का कत्ल हुआ है कत्ल इस कत्ल को यु छुपाया ना जायेगा



Deepak "bedil"..........08:00 pm......30.5.2009

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hello


Sahitya Shilpi
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घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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