" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

होरी खेलन जाऊ...............''बेदिल''

>> गुरुवार, 12 मार्च 2009

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भीगी , भीगी , भीगी रे चुनरिया मोरी

पकड़ी गई रे चोरी कन्हईया तोरी

जटा जाल महाकाल विकराल

रस गाल मधुबाल ससुराल

आज ना चलन देऊ सीना जोरी

भीगी , भीगी , भीगी रे चुनरिया मोरी

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छान, बान, मान करो रसपान

जान,आन बड़ा देहु है दान

फास,सास,मॉस कभी दुःख देहु ना मोई

आख, जाच, राच पढ़े जो माने कोई

जडी जटिल प्रेम की आज पिऊ तोरी

भीगी , भीगी , भीगी रे चुनरिया मोरी
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आग, राग, फाग, साग आलोकिक गहने

प्रकर्ति प्रेम अनूप है पढ़े तो लगे महने

रहन, सहन, कहन, सोचो जरा को

उठान सो फायदा नहीं मरा को

गुरु इक्छा ईश्वर है कैसे जाऊ छोरी

भीगी , भीगी , भीगी रे चुनरिया मोरी
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काम, क्रोध, मद, लोभ, ना देखे ईश्वर कोई

जात, आत, मात, रात, कभी ना भूले कोई

"मान" गुरु सौदंर्य सम्पूर्ण सुलेखा

"बेदिल" चाँद-चादनी कबहु ना भुलेखा

होरी रात भेदी इहु चोरी

भीगी , भीगी , भीगी रे चुनरिया मोरी
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10-03-2009 (7:30pm)

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hello


Sahitya Shilpi
http://www.chitthajagat.in/?ping=http://ajaaj-a-bedil.blogspot.com/

घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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