" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

तेरी महफ़िल में हमने आना छोड़ दिया..................ग़जल

>> शुक्रवार, 13 मार्च 2009


तेरी महफ़िल में हमने आना छोड़ दिया


महफ़िल--हिंद में हँस के हँसाना छोड़ दिया



इस गरदिश--आयाम में सावन कहा बाकी


तुने भी हँस कर बुलाना छोड़ दिया



महकते बदन पर नककाशी तेरे गजब की है


फ़ानुज को भी अब तुने जलाना छोड़ दिया



काशिद के इन्तजार में उम्र बीत गई है मेरी


तेरा ख़त आया जब जमाना छोड़ दिया



कयामत की रात में एहतेमाम करुगा मै


"बेदिल" ने करके तुझे बहाना छोड़ दिया.



13-03-2009 (5:00 pm)

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hello


Sahitya Shilpi
http://www.chitthajagat.in/?ping=http://ajaaj-a-bedil.blogspot.com/

घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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