" यही मंदिर , यही मस्जिद , यही तख्ते मुहम्मद हैं

चले आओ 'बेदिल' यही वादी-ए-जन्नत है "

पंजाबी ग़जल--"कलेया दा साडा जी नी लगदा"--

>> मंगलवार, 10 मार्च 2009

पंजाबी ग़जल


कलेया दा साडा जी नी लगदा


धिरदे बददल मैणु मिह नी लगदा



परदेस जदों आये आपा मित्रा नाल

मापया दे हथा दा स्वाद अत्थो सी नी लगदा


गंडे ते खेता विचो खेल खेलया असी

इतथो रोटिया दी गिनती शरीर विचो घी नी लगदा


साडा वतन प्यारा छडिया ना ज्योंदा

पता नी मैणु इत्थे जी की नी लगदा


हासया-हासया विचो पराया तो आन बैठा

आन्दे ने हन्जू साडा रब हसी नी लगदा


सोणिया नाल वादे सारे तोड़ ओंदा सी

जदों खुश होन्दे असी तदो रबा साडा खुसी नी लगदा


की लिखया असी पंजाबी नाल अथो ना कोई

मान सी साडा पर "बेदिल" मसिह नी लगदा




10-03-2009 (6:25 pm)

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hello


Sahitya Shilpi
http://www.chitthajagat.in/?ping=http://ajaaj-a-bedil.blogspot.com/

घनिष्ट मित्र का तोफा

तोहमतें कई मेरे पीछे मुझपे लगाता है वो
खुलकर बात करने में मग़र शरमाता है वो

कभी सिखाया करता था भले-बुरे का भेद जो
आज खुद ही बुराई का शहंशाह कहलाता है वो

फाँस भी कोई अगर उसे कभी चुभ जाती थी
रोता था मेरे पहलू में, आज मुझे रुलाता है वो

मसलसल जलता रहा लौ बनके जिसके लिए
देखकर कर भी घाव मेरे पीठ दिखाता है वो

पढ़-पढ़कर आँखों में ख़्वाब पूरे किए थे जिसके
एक प्यार की हकीकत पे फूल देके बहलाता है वो


--अमित के सागर


अजीब शख्स था कैसा मिजाज़ रखता था
साथ रह कर भी इख्तिलाफ रखता था

मैं क्यों न दाद दूँ उसके फन की
मेरे हर सवाल का पहले से जवाब रखता था

वो तो रौशनियों का बसी था मगर
मेरी अँधेरी नगरी का बड़ा ख्याल रखता था

मोहब्बत तो थी उसे किसी और से शायद
हमसे तो यूँ ही हसी मज़ाक रखता था

--अहमद फराज़
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